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जय श्री कृष्ण

  जय श्री कृष्ण     यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥ योग: कर्मसु कौशलम् ( अध्याय 2, श्लोक 50)  (कर्मों में कुशलता ही योग है)। इसका अर्थ है कि अपने काम को पूरी ईमानदारी और मेहनत से करना ही सबसे बड़ी पूजा है। भक्ति का अर्थ काम छोड़ना नहीं, बल्कि काम को 'सही तरीके' से करना है ताकि बरकत बनी रहे।